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unit-4- मानव जीवन की आम धारणा

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मनुष्य जीवन का मूल उदेश्य  बड़ा होकर पढ़-लिखकर अपने निर्वाह की खोज करके विवाह कराकर परिवार पोषण करेंगे। बच्चों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाऐंगे। फिर उनको रोजगार मिल जाए। उनका विवाह करेंगे। परमात्मा संतान को संतान दे। फिर हमारा कर्तव्य पूरा हुआ। कई बार गाँव या गवांड (पड़ौसी गाँव) के वृद्ध इकट्ठे होते तो आपस में कुशल-मंगल जानते तो एक ने कहा कि परमात्मा की कृपा से दो लड़के तथा दो लड़की हैं। कठिन परिश्रम करके पाला-पोसा तथा पढ़ाया, विवाह कर दिया। सब के सब बेटा-बेटियों वाले हैं। मेरा कार्य पूर्ण हुआ। 75 वर्ष का हो गया हूँ। अब बेशक मौत हो जाए, मेरा जीवन सफल हुआ। वंश बेल चल पड़ी, संसार में नाम रहेगा। विवेचन: - उपरोक्त प्रसंग में जो भी प्राप्त हुआ, वह पूर्व निर्धारित संस्कार ही प्राप्त हुआ, नया कुछ नहीं मिला। एक व्यक्ति का विवाह हुआ। संतान रूप में बेटी हुई। मानव समाज की धारणा रही है कि पुत्रा नहीं है तो उसका वंश नहीं चलता। (परंतु आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से पुत्रा-पुत्राी में कोई अंतर नहीं माना जाता) आशा लगी कि दूसरा पुत्र तो बेटा...

unit - 3 मनुष्य जीवन का उद्देश्य

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पार्ट 1  एक भक्त सत्संग में जाने लगा। दीक्षा ले ली, ज्ञान सुना और भक्ति करने लगा। अपने मित्र से भी सत्संग में चलने तथा भक्ति करने के लिए प्रार्थना की। परंतु दोस्त नहीं माना। कह देता कि कार्य से फुर्सत (खाली समय) नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे हैं। इनका पालन-पोषण भी करना है। काम छोड़कर सत्संग में जाने लगा तो सारा धँधा चैपट हो जाएगा। वह सत्संग में जाने वाला भक्त जब भी सत्संग में चलने के लिए अपने मित्र से कहता तो वह यही कहता कि अभी काम से फुर्सत नहीं है। एक वर्ष पश्चात् उस मित्र की मृत्यु हो गई। उसकी अर्थी उठाकर कुल के लोग तथा नगरवासी चले, साथ-साथ सैंकड़ों नगर-मौहल्ले के व्यक्ति भी साथ-साथ चले। सब बोल रहे थे कि राम नाम सत् है, सत् बोले गत् है। भक्त कह रहा था कि राम नाम तो सत् है परंतु आज भाई को फुर्सत है। नगरवासी कह रहे थे कि सत् बोले गत् है, भक्त कह रहा था कि आज भाई को फुर्सत है। अन्य व्यक्ति उस भक्त से कहने लगे कि ऐसे मत बोल, इसके घर वाले बुरा मानेंगे। भक्त ने कहा कि मैं तो ऐसे ही बोलूँगा। मैंने इस मूर्ख से हाथ जोड़कर प्...

Unit -2 भक्ति मार्ग पर यात्रा

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विशेष विवरण जब तक आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, तब तक तो जीव माया के नशे में अपना उद्देश्य भूल चुका था और जैसा ऊपर बताया है कि शराबी नशे में ज्येष्ठ महीने की गर्मी में दिन के दोपहर के समय धूप में पड़ा-पड़ा पसीने व रेत में सना भी कह रहा होता है कि मौज हो रही है। परंतु नशा उतरने के पश्चात् उसे पता चलता है कि तू तो जंगल में पड़ा है, घर तो अभी दूर है। कबीर जी ने कहा है कि:- कबीर, यह माया अटपटी, सब घट आन अड़ी। किस-किस को समझाऊँ, या कूएै भांग पड़ी।। अध्यात्म ज्ञान रूपी औषधि सेवन करने से जीव का नशा उतर जाता है। फिर वह भक्ति के सफर पर चलता है क्योंकि उसे परमात्मा के पास पहुँचना है जो उसका अपना पिता है तथा वह सतलोक जीव का अपना घर है। यात्रा पर चलने वाला व्यक्ति सारे सामान को उठाकर नहीं चल सकता। केवल आवश्यक सामान लेकर यात्रा पर चलता है। इसी प्रकार भक्ति के सफर में अपने को हल्का होकर चलना होगा। तभी मंजिल को प्राप्त कर सकेंगे। भक्ति रूपी राह पर चलने के लिए अपने को मानसिक शांति का होना अनिवार्य है। मानसिक परेशानी का कारण है अपनी परंपराऐं तथा नशा,...

Unit-1- संतो की शिक्षा

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संतो की शिक्षा पार्ट 1 आज के समय मे हम भगवान को भूल गए है, इसका मुख्य कारण ये है की हमे यह वहां हो गया हे की हम इस मृत्यु लोक मे सदा ही ऐसे रहेंगे पर ऐसा नहीं हे। एक गाँव का व्यक्ति पहली बार श्री नानक देव जी के पास गया। उसने देखा कि संत जी मायूस अवस्था में एकांत में बैठे थे।(स्मरण कर रहे थे) उस आदमी ने सतनाम-वाहेगुरू बोला। श्री नानक जी ने भी उत्तर दिया। भोजन करवाया। ज्ञान विचार सुनाए। वह व्यक्ति चला गया। एक दिन फिर वही व्यक्ति आया और बोला महाराज जी! आप कभी खुश दिखाई नहीं देते। क्या कारण है? संत नानक जी ने कहा कि:- ना जाने काल की कर डारे, किस विधि ढ़ल जा पासा वे। जिन्हाते सिर ते मौत खुड़कदी, उन्हानूं केहड़ा हांसा वे।। भावार्थ:- संत नानक जी ने कहा कि हे भाई! इस मृत्युलोक में सब नाशवान हैं। पता नहीं किसकी जाने की बारी कब आ जाए? इसलिए जिनके सिर पर मौत गर्ज रही हो, उस व्यक्ति को नाचना-गाना, हँसी-मजाक कैसे अच्छा लगेगा? मूर्ख या नशे वाला व्यक्ति इस गंदे लोक में खुशी मनाता है। जैसे एक व्यक्ति की पत्नी को विवाह के दस वर्ष पश्चात् पुत्रा हुआ। ...